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तेल-गैस के प्रोजेक्ट अब 15 साल में चालू, इंडस्ट्री के गोल्डन पीरियड से तीन गुना स्लो

Posted on March 3, 2026

तेल और गैस इंडस्ट्री कभी स्पीड के लिए जानी जाती थी।

खोज हुई, डेवलपमेंट प्लान बना, चार पांच साल में प्रोडक्शन शुरू।

अब औसत समय 15 साल से ऊपर चला गया है।

की मार्च 2026 में जारी नई रिपोर्ट बताती है कि 2025 में जिन ऑयल और गैस फील्ड्स ने प्रोडक्शन शुरू किया, उन्हें खोज से लेकर कमर्शियल ऑपरेशन तक पहुंचने में औसतन 15.1 साल लगे। 1960 से 1980 के बीच, जिसे इंडस्ट्री का गोल्डन पीरियड माना जाता है, यही औसत सिर्फ 4.9 साल था।

यानी डेवलपमेंट साइकिल तीन गुना लंबा हो चुका है।

यह विश्लेषण के डेटाबेस पर आधारित है, जिसे GEM लगातार अपडेट करता है। रिपोर्ट बताती है कि 2010 से 2020 के बीच औसत समय लगभग 16 साल तक पहुंच गया था। 2019 में यह 20.7 साल रहा, जिसमें कई बड़े रूसी प्रोजेक्ट्स की देरी ने औसत को ऊपर खींचा।

टाइमलाइन क्यों बढ़ी

कारण साफ है।

इंडस्ट्री अब आसान रिज़र्व से आगे बढ़ चुकी है।

रिपोर्ट के मुताबिक कंपनियां अब गहरे समुद्र, हाई प्रेशर और ज्यादा टेक्निकली कॉम्प्लेक्स भंडारों में जा रही हैं। ऑफशोर प्रोजेक्ट्स ऑनशोर के मुकाबले औसतन तीन साल ज्यादा लेते हैं। ड्रिलिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर, पाइपलाइन कनेक्टिविटी, सब कुछ ज्यादा जटिल और महंगा।

भी हालिया आकलन में कह चुका है कि आसानी से सुलभ भंडार काफी हद तक समाप्त हो चुके हैं। अब छोटे, गहरे और ज्यादा चुनौतीपूर्ण फील्ड्स बचे हैं, जिनका डेवलपमेंट स्वाभाविक रूप से लंबा होगा।

लंबी टाइमलाइन का असली मतलब

15 साल का डेवलपमेंट साइकिल सिर्फ टेक्निकल फैक्ट नहीं है।

यह फाइनेंशियल और पॉलिसी रिस्क की कहानी है।

आज अगर कोई फील्ड डिस्कवर होती है, तो वह 2030 के दशक के आखिर में या उससे भी बाद में प्रोडक्शन शुरू कर सकती है। तब तक एनर्जी मार्केट, क्लाइमेट पॉलिसी और डिमांड पैटर्न बदल चुके होंगे।

IEA के नेट ज़ीरो सीनारियो में अपस्ट्रीम ऑयल और गैस इन्वेस्टमेंट समय के साथ तेज़ी से घटता है। इसका मतलब है कि जिन प्रोजेक्ट्स में आज अरबों डॉलर लगाए जा रहे हैं, वे ऐसे समय में चालू हो सकते हैं जब दुनिया क्लीनर एनर्जी सिस्टम की ओर ज्यादा प्रतिबद्ध हो चुकी होगी।

रिपोर्ट के को-ऑथर और प्रोजेक्ट मैनेजर स्कॉट ज़िमरमैन का कहना है, “पंद्रह साल के डेवलपमेंट साइकिल का मतलब है कि कंपनियां बेहद अनिश्चित भविष्य पर लंबी अवधि का दांव लगा रही हैं। ऐसे समय में जब कार्बन मेजर्स पर मार्जिन प्रेशर है और ऑयल प्राइस स्लंप कर रहे हैं, महंगे व्हाइट एलिफेंट प्रोजेक्ट्स का पीछा करना विफल हो सकता है। निवेश को डिमांड रिडक्शन और रिन्यूएबल एनर्जी की तरफ जाना चाहिए, जो असली एनर्जी सिक्योरिटी दे सकते हैं।”

स्ट्रैंडेड एसेट का खतरा

लंबी टाइमलाइन का मतलब है ज्यादा एक्सपोजर।

कॉस्ट ओवररन का रिस्क।

रेगुलेटरी बदलाव का रिस्क।

डिमांड शिफ्ट का रिस्क।

अगर 15 साल बाद फॉसिल फ्यूल की ग्लोबल डिमांड उम्मीद से कम रहती है, तो ये प्रोजेक्ट्स स्ट्रैंडेड एसेट बन सकते हैं। यानी ऐसी परिसंपत्तियां जिनमें पैसा लगा, लेकिन रिटर्न पूरा नहीं मिला।

आज इंडस्ट्री जिस पूंजी को लॉक कर रही है, वह कई सालों तक रेवेन्यू जेनरेट नहीं करेगी। ऐसे में शेयरहोल्डर वैल्यू, कर्ज संरचना और लॉन्ग टर्म डिमांड अनुमान सभी पर सवाल उठ सकते हैं।

एनर्जी ट्रांजिशन के बीच लंबा दांव

यह पूरी कहानी एनर्जी ट्रांजिशन के दौर में और भी अहम हो जाती है।

जब दुनिया इलेक्ट्रिफिकेशन, रिन्यूएबल्स और एफिशिएंसी की तरफ बढ़ रही है, तब 15 साल लंबी परियोजनाएं रणनीतिक बहस का हिस्सा बनती हैं।

सवाल यह नहीं कि तेल और गैस तुरंत खत्म हो जाएंगे।

सवाल यह है कि क्या इतने लंबे और महंगे प्रोजेक्ट्स उस भविष्य के साथ फिट बैठेंगे, जो पॉलिसी और बाजार संकेत दे रहे हैं।

तेल और गैस इंडस्ट्री की घड़ी अब पहले जैसी नहीं चल रही।

समय लंबा हो गया है।

और अनिश्चितता भी।

  • oil and gas

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