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Climate कहानी

भारत के जलवायु लक्ष्य जारी: तेल संकट के बीच संतुलित चाल

Posted on March 25, 2026

दिल्ली में कैबिनेट की एक बैठक खत्म होती है। बाहर दुनिया में हालात अलग हैं। पश्चिम एशिया में युद्ध, सप्लाई चेन टूटती हुई, तेल की कीमतें चढ़ती हुईं।

ऐसे समय में भारत अपना अगला क्लाइमेट रोडमैप जारी करता है। यह सिर्फ एक दस्तावेज़ नहीं है। यह उस दिशा का संकेत है जिसमें देश आने वाले दशक में चलना चाहता है।

प्रधानमंत्री Narendra Modi की अध्यक्षता में कैबिनेट ने भारत के अपडेटेड नेशनल्ली डिटरमाइंड कंट्रीब्यूशन्स, यानी NDC 3.0 को मंजूरी दे दी है। यह 2031–2035 के लिए देश की जलवायु प्रतिबद्धताओं का खाका है।

कहानी यहाँ से शुरू नहीं होती

भारत के लिए यह पहली बार नहीं है। असल कहानी थोड़ी पीछे से शुरू होती है।
2015 में जब पेरिस समझौते के तहत भारत ने अपने लक्ष्य तय किए थे, तब बहुतों को शक था कि क्या यह संभव भी होगा। लेकिन भारत ने 2030 के कई बड़े लक्ष्य समय से पहले हासिल कर लिए।

GDP की एमिशन  इंटेंसिटी में 36% की कमी (2005–2020)
52% से ज्यादा बिजली क्षमता नॉन-फॉसिल स्रोतों से
2.3 अरब टन का कार्बन सिंक

यानी, जो वादा था, उससे पहले डिलीवरी।

NDC 3.0 क्या कहता है

अब नया लक्ष्य सामने है।

2035 तक उत्सर्जन तीव्रता में 47% की कमी
60% बिजली क्षमता नॉन-फॉसिल स्रोतों से
3.5 से 4 अरब टन का कार्बन सिंक

पहली नजर में यह लक्ष्य “संयमित” लग सकते हैं। लेकिन यही इस कहानी का दिलचस्प मोड़ है।

यह सिर्फ आंकड़ों की बात नहीं है। NDC 3.0 पाँच गुणात्मक वादे भी करता है – रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर, एडाप्टेशन, LiFE, जस्ट ट्रांजिशन, और सेक्टोरल एकीकरण।

कमिटमेंट कम, ambition ज्यादा?

भारत के अपने ही प्लान कुछ और कहते हैं।
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के अनुमान के मुताबिक, 2035 तक 70% बिजली क्षमता नॉन-फॉसिल हो सकती है। लेकिन UN के सामने भारत ने 60% का लक्ष्य रखा है।

यह फर्क क्या बताता है? एक तरह से यह दोहरी रणनीति है।
ग्लोबल मंच पर सतर्क प्रतिबद्धता, और घरेलू स्तर पर ज्यादा महत्वाकांक्षा।

WRI की Ulka Kelkar कहती हैं, “2035 के ये लक्ष्य और नेट ज़ीरो 2070 के रोडमैप यह दिखाते हैं कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत लंबी अवधि में स्थिर प्रतिबद्धता बनाए हुए है। यह भी सकारात्मक है कि घरेलू स्तर पर नॉन-फॉसिल क्षमता का लक्ष्य इससे ज्यादा रखा गया है।”

दुनिया पीछे हट रही है, भारत आगे बढ़ रहा है?

यह घोषणा ऐसे समय आई है जब कई विकसित देश अपनी क्लाइमेट प्रतिबद्धताओं को लेकर पीछे हटते दिख रहे हैं। ऊर्जा सुरक्षा, युद्ध, और महंगाई ने प्राथमिकताएं बदल दी हैं।
लेकिन भारत ने एक अलग रास्ता चुना है।
Grantham Research Institute की Dhruba Purkayastha इसे सीधे शब्दों में कहते हैं, “जब दुनिया में क्लाइमेट को लेकर momentum कम होता दिख रहा है, तब भारत का ट्रैक पर बने रहना एक मजबूत संकेत है। खासकर BRICS की अध्यक्षता के दौरान यह एक संभावित नेतृत्व की दिशा भी दिखाता है।”

इस पर Climate Trends की संस्थापक Aarti Khosla का कहना है,
“भारत के अपडेटेड NDC targets एक ऐसी क्लाइमेट रणनीति को दिखाते हैं जो ज़मीन से जुड़ी भी है और आगे की सोच भी रखती है। खासकर ऐसे समय में, जब दुनिया का global order बिखरा हुआ है और energy policy को लेकर अनिश्चितता बढ़ रही है। 2035 तक 47% emission intensity घटाने और 60% non-fossil capacity का लक्ष्य यह दिखाता है कि भारत अपनी महत्वाकांक्षा को बनाए रखते हुए अपनी घरेलू वास्तविकताओं को भी समझ रहा है। यह अप्रोच Global South के लिए भी एक सकारात्मक संकेत है, जहां विकास और क्लाइमेट एक साथ लेकर चलना जरूरी है।”

ध्यान देने वाली बात है कि भारत ने फरवरी 2025 की UN डेडलाइन और दिसंबर 2025 का अपना वादा, दोनों मिस किए। वजह साफ थी: विकसित देशों से क्लाइमेट फाइनेंस पर निराशा।

लेकिन कहानी पूरी तरह सरल नहीं है

हर कहानी में एक दूसरा पक्ष भी होता है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत ने अपनी क्षमता से कम लक्ष्य तय किए हैं।

Centre for Research on Energy and Clean Air की फाउंडर Lauri Myllyvirta का कहना है, “भारत का 60% नॉन-फॉसिल लक्ष्य मौजूदा गति को देखते हुए 2030 से पहले ही हासिल हो सकता है। यानी असली क्षमता इससे कहीं ज्यादा है, जितनी प्रतिबद्धता में दिखाई गई है।”

यानी, सवाल यह है कि क्या भारत ने सुरक्षित खेला है?

ऊर्जा, अर्थव्यवस्था और राजनीति का संतुलन

इस पूरे फ्रेमवर्क को समझने के लिए एक बात याद रखनी होगी। भारत एक तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ रही है। और अभी भी कोयला इसकी रीढ़ है।
ऐसे में 47% उत्सर्जन तीव्रता का लक्ष्य एक संतुलन बनाता है। विकास भी जारी रहे, और उत्सर्जन भी नियंत्रित हो।
CEEW के Vaibhav Chaturvedi कहते हैं, “आज के समय में ऊर्जा सुरक्षा और कीमतें दोनों अनिश्चित हैं। ऐसे में यह लक्ष्य दिखाता है कि भारत जलवायु और आर्थिक जोखिम दोनों को साथ लेकर चल रहा है।”

इस बार फोकस सिर्फ बिजली पर नहीं है

NDC 3.0 की खास बात यह है कि यह सिर्फ बिजली या उत्सर्जन की बात नहीं करता। यह पूरी अर्थव्यवस्था को देखता है।

रेलवे का इलेक्ट्रिफिकेशन
ग्रीन हाइड्रोजन
क्लाइमेट-रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर
और सबसे अहम, व्यवहार में बदलाव सरकार ने “Lifestyle for Environment”, यानी LiFE को भी इसमें शामिल किया है।
AC को 24 डिग्री पर रखना, पानी बचाना, छोटी-छोटी आदतें बदलना।
यानी, क्लाइमेट अब सिर्फ पॉलिसी नहीं, रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनने की कोशिश है।

क्लाइमेट कहानी का असली मोड़

इस पूरी कहानी को एक लाइन में समझना हो तो शायद यह होगा: भारत तेज़ दौड़ सकता है।लेकिन उसने फिलहाल steady pace चुना है।
दुनिया में जब अनिश्चितता बढ़ रही है, भारत ने जोखिम और जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है।

यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। असल कहानी अब शुरू होगी, जब ये लक्ष्य जमीन पर उतरेंगे।

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