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धीमी पड़ी एमिशन की रफ्तार, क्या भारत एनर्जी ट्रांजिशन के मोड़ पर है

Posted on March 26, 2026

भारत की अर्थव्यवस्था के साथ एमिशन के तेजी से बढ़ने का जो पुराना पैटर्न रहा है, उसमें 2025 एक अलग संकेत लेकर आया है। Centre for Research on Energy and Clean Air के विश्लेषण, जिसे Lauri Myllyvirta और Anubha Bhardwaj ने तैयार किया है, के अनुसार 2025 में भारत के कार्बन डाइऑक्साइड एमिशन में वृद्धि केवल 0.7% रही, जबकि साल के दूसरे हिस्से में यह और घटकर 0.5% पर आ गई। पिछले चार वर्षों में जहां यह दर 4% से 11% के बीच रही थी, वहीं यह गिरावट 2001 के बाद सबसे धीमी वृद्धि को दर्शाती है, कोविड प्रभावित 2020 को छोड़कर।

इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ा कारण बिजली क्षेत्र में आया परिवर्तन है। 2025 में पावर सेक्टर के एमिशन 3.8% तक घट गए, जिसकी मुख्य वजह रिकॉर्ड स्तर पर क्लीन एनर्जी की बढ़ोतरी और अपेक्षाकृत कमजोर बिजली मांग रही। 2025 में जो नई क्लीन एनर्जी क्षमता जुड़ी है, उससे हर साल लगभग 90 टेरावॉट घंटे अतिरिक्त बिजली उत्पादन की संभावना है, जो अब तक का सबसे बड़ा विस्तार है और 2024 के पिछले रिकॉर्ड से लगभग दोगुना है। जिन राज्यों में पवन और सौर ऊर्जा का विस्तार तेज रहा, वहां कोयला आधारित बिजली उत्पादन में सबसे अधिक कमी दर्ज की गई।

हालांकि कुल तस्वीर अभी भी मिश्रित बनी हुई है। स्टील उत्पादन में 8% और सीमेंट उत्पादन में 10% की वृद्धि दर्ज की गई, जिससे यह स्पष्ट होता है कि बुनियादी ढांचे और निर्माण गतिविधियों की मांग अभी भी मजबूत है। यही कारण है कि गैस की खपत में 4% की गिरावट और कोयला आधारित बिजली में कमी के बावजूद कुल एमिशन में मामूली वृद्धि दर्ज हुई।

ऊर्जा आयात के संदर्भ में भी कुछ महत्वपूर्ण बदलाव सामने आए हैं। 2025 में बिजलीघरों में आयातित कोयले की खपत में 20% की गिरावट आई, जबकि गैस आयात 6% कम हुआ और तेल आयात लगभग स्थिर रहा। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और संभावित आपूर्ति व्यवधानों के बीच यह रुझान भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे बाहरी झटकों के प्रति संवेदनशीलता में कुछ कमी आती है।

विश्लेषण यह भी संकेत देता है कि भारत का बिजली क्षेत्र एक संभावित बदलाव के बिंदु के करीब पहुंच रहा है, जहां क्लीन एनर्जी की नई क्षमता बिजली की बढ़ती मांग को पूरा करने में सक्षम हो सकती है। यदि यह रुझान स्थिर रहता है, तो यह वह चरण हो सकता है जहां आर्थिक वृद्धि के साथ एमिशन की वृद्धि का सीधा संबंध कमजोर पड़ने लगे।

आगे के संकेत भी इसी दिशा में इशारा करते हैं। पेट्रोकेमिकल क्षेत्र में तेल की मांग धीमी हो रही है और स्टील तथा सीमेंट जैसे ऊर्जा-गहन क्षेत्रों में भी इसकी वृद्धि दर कम होने की संभावना जताई जा रही है। यह बदलाव यदि व्यापक रूप लेता है, तो भारत के ऊर्जा और औद्योगिक ढांचे में संरचनात्मक परिवर्तन की शुरुआत हो सकती है।

कुल मिलाकर, 2025 के आंकड़े किसी बड़े परिवर्तन की घोषणा नहीं करते, लेकिन यह जरूर संकेत देते हैं कि भारत की एमिशन वृद्धि की रफ्तार धीमी पड़ रही है। यह बदलाव अभी शुरुआती और आंशिक है, लेकिन यह इस संभावना की ओर इशारा करता है कि आने वाले वर्षों में भारत की विकास और एमिशन की कहानी एक नए संतुलन की ओर बढ़ सकती है।

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