Skip to content
Menu
Climate कहानी
  • आइए, आपका स्वागत है!
  • बुनियादी बातें
  • चलिए पढ़ा जाये
  • आपकी कहानी
  • सम्पर्क
  • शब्दकोश
Climate कहानी

चल पड़ी पहली हाइड्रोजन ट्रेन … मगर मंज़िल महज़ रेलवे नहीं

Posted on July 18, 2026

अगर मैं आपसे पूछूं कि भारत ने हाइड्रोजन ट्रेन क्यों बनाई, तो शायद पहला जवाब होगा. ताकि डीज़ल की जगह एक साफ़ ईंधन इस्तेमाल हो सके।

जवाब सही है। लेकिन पूरी कहानी नहीं।

असल सवाल यह है कि जब भारतीय रेलवे का लगभग पूरा ब्रॉडगेज नेटवर्क पहले ही बिजली से चलने लगा है, तो फिर हाइड्रोजन ट्रेन की ज़रूरत क्यों पड़ी?

यहीं से इस खबर की असली कहानी शुरू होती है।

हरियाणा के जींद–सोनीपत रेलखंड (करीब 90 किलोमीटर) पर भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन शुरू हुई है। यह सिर्फ़ एक नई ट्रेन नहीं, बल्कि भारत के ग्रीन हाइड्रोजन मिशन की चलती. फिरती प्रयोगशाला है।

हाइड्रोजन ट्रेन चलती कैसे है?

इस ट्रेन में डीज़ल इंजन नहीं है।

इसके ऊपर लगे विशेष टैंकों में हाइड्रोजन गैस भरी जाती है। यह हाइड्रोजन फ्यूल सेल में हवा की ऑक्सीजन के साथ प्रतिक्रिया करती है और बिजली बनाती है। यही बिजली ट्रेन के मोटर, एसी, लाइट और बाकी सिस्टम चलाती है।

इस पूरी प्रक्रिया में धुआँ नहीं निकलता। केवल पानी की भाप निकलती है। यानी पटरी पर चलते समय यह ट्रेन स्थानीय स्तर पर लगभग शून्य उत्सर्जन करती है।

ध्यान देने वाली बात यह है कि ट्रेन के आसपास की हवा साफ़ रहती है, हालाँकि हाइड्रोजन बनाने की प्रक्रिया कितनी हरी है, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि बिजली कहाँ से आती है।

क्या यह दुनिया की सबसे आधुनिक ट्रेन है?

इस 10 डिब्बों वाली ट्रेन में करीब 2600 यात्री सफ़र कर सकेंगे। इसे 75–120 किमी/घंटा की गति वाले उपनगरीय रूटों के लिए डिज़ाइन किया गया है। इसमें मेट्रो जैसी ऑटोमैटिक बंद होने वाली दरवाज़े, आधुनिक डिस्प्ले, एयर कंडीशनिंग और कई सुरक्षा प्रणालियाँ हैं। हाइड्रोजन रिसाव या आग की आशंका होने पर तुरंत अलर्ट देने वाले सेंसर भी लगाए गए हैं।

इसका एक बड़ा दावा यह भी है कि यह अपनी श्रेणी की दुनिया की सबसे शक्तिशाली हाइड्रोजन ट्रेनों में शामिल है।

लेकिन जब बिजली वाली ट्रेनें पहले से हैं, तो हाइड्रोजन क्यों?

यही सबसे दिलचस्प सवाल है।

अगर किसी रेलमार्ग पर पहले से बिजली की लाइन मौजूद है, तो इलेक्ट्रिक ट्रेन आज भी हाइड्रोजन ट्रेन से ज़्यादा ऊर्जा दक्ष और सस्ती मानी जाती है।

फिर रेलवे हाइड्रोजन पर इतना निवेश क्यों कर रहा है?

क्योंकि इस ट्रेन की मंज़िल सिर्फ़ यात्रियों को एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक पहुँचाना नहीं है।

भारत हाइड्रोजन बनाना, उसे सुरक्षित तरीके से जमा करना, ट्रेन में भरना, फ्यूल सेल बनाना और इस पूरी तकनीक में आत्मनिर्भर होना चाहता है।

यानी यह ट्रेन एक पूरे हाइड्रोजन इकोसिस्टम की शुरुआत है। हाइड्रोजन ट्रेन को आज की तारीख में ‘क्लाइमेट सॉल्यूशन’ से ज़्यादा ‘टेक्नोलॉजी डेमो’ और इंडस्ट्री‑बिल्डिंग प्रोजेक्ट के रूप में देखना ज़्यादा ईमानदार होगा।

क्या इससे रेल किराया सस्ता होगा?

फिलहाल इसकी उम्मीद नहीं करनी चाहिए।

एक हाइड्रोजन ट्रेन बनाने में लगभग 80 करोड़ रुपये तक का खर्च आ सकता है। इसके अलावा हाइड्रोजन बनाने, स्टोर करने और भरने का अलग इंफ्रास्ट्रक्चर भी बनाना पड़ता है, जिसकी लागत भी दर्जनों करोड़ रुपये है।

आज के समय में ग्रीन हाइड्रोजन, बिजली या डीज़ल की तुलना में अभी महंगी है।

इसलिए आज की तारीख में यह परियोजना ‘किराया घटाने’ नहीं, बल्कि ‘भविष्य की लागत को predictable रखने’ और फॉसिल ईंधन पर निर्भरता घटाने की दिशा में उठाया गया कदम है।

हालांकि भविष्य में अगर ग्रीन हाइड्रोजन सस्ती हो जाती है और इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन होने लगता है, तो परिचालन लागत स्थिर रखने में मदद मिल सकती है। लेकिन अभी ऐसा कहना जल्दबाज़ी होगी।

फिर फायदा किसे होगा?

यात्रियों को कम शोर, साफ़ हवा और आधुनिक सफ़र का अनुभव मिलेगा।

रेलवे को उन इलाकों के लिए एक विकल्प मिलेगा, जहाँ बिजली की लाइन बिछाना मुश्किल या बहुत महंगा है।

और सबसे बड़ा फायदा देश को हो सकता है। 

भारत ने 2070 तक नेट‑ज़ीरो उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है; स्टील, उर्वरक और हैवी ट्रांसपोर्ट जैसे ‘कठिन सेक्टरों’ में ग्रीन हाइड्रोजन एक प्रमुख औज़ार माना जा रहा है। यह ट्रेन उस दिशा में शुरुआती अभ्यास है।

अगर भारत हाइड्रोजन तकनीक में महारत हासिल करता है, तो यही तकनीक आगे चलकर स्टील, उर्वरक, भारी ट्रकों और जहाज़ जैसे उन क्षेत्रों में भी काम आ सकती है, जहाँ सिर्फ़ बिजली से काम चलाना आसान नहीं है।

असल कहानी

पहली नज़र में यह सिर्फ़ एक नई ट्रेन लगती है। लेकिन असल में यह भारत की ऊर्जा व्यवस्था में एक बड़े बदलाव की तैयारी है।

कई बार कोई ट्रेन सिर्फ़ यात्रियों को नहीं ले जाती।

वह एक नई तकनीक, नया उद्योग और भविष्य की नई दिशा भी साथ लेकर चलती है।

  • green hydrogen
  • hydrogen policy
  • hydrogen train

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

क्लाइमेट की कहानी, मेरी ज़बानी

©2026 Climate कहानी | WordPress Theme: EcoCoded