दुनिया जब तेल की कीमतों और युद्ध के असर से जूझ रही है, उसी वक्त एक अलग कहानी भी ख़ामोशी से बन रही है। ये कहानी उन देशों की है, जिन्हें हम अक्सर “कमजोर” या “विकासशील” कह देते हैं, लेकिन क्लाइमेट के मोर्चे पर वही देश अब रफ्तार तय कर रहे हैं।
Ember की नई रिपोर्ट एक सीधी, लेकिन चौंकाने वाली बात सामने रखती है। दुनिया के सबसे ज्यादा क्लाइमेट जोखिम झेल रहे देशों में से करीब आधे देश अब सोलर एनर्जी अपनाने में अमेरिका से आगे निकल चुके हैं।
यह रिपोर्ट ऐसे वक्त आई है जब पश्चिम एशिया में संघर्ष के चलते तेल की कीमतें फिर से उछल रही हैं। और इसका सबसे ज्यादा असर उन्हीं देशों पर पड़ता है, जो पहले से आर्थिक और ऊर्जा असुरक्षा से जूझ रहे हैं।
लेकिन इस बार कहानी सिर्फ “झटका” की नहीं है। कहानी “जवाब” की भी है।
Climate Vulnerable Forum और V20 Finance Ministers जैसे 74 देशों के इस समूह में, जो करीब 1.7 अरब लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं, एक बड़ा बदलाव दिख रहा है। आधे से ज्यादा देश अब पूरी अर्थव्यवस्था में बिजली के इस्तेमाल यानी इलेक्ट्रिफिकेशन में भी अमेरिका से आगे निकल चुके हैं।
इस बदलाव की असली वजह टेक्नोलॉजी नहीं, उसकी कीमत है।
पिछले एक दशक में सोलर, बैटरी और इलेक्ट्रिक टेक्नोलॉजी की लागत 30% से 95% तक गिर चुकी है। इसका मतलब साफ है, अब सोलर सिर्फ “ग्रीन विकल्प” नहीं रहा, बल्कि कई जगहों पर यह सबसे सस्ता विकल्प बन चुका है।
और जहां ग्रिड पहुंचाना मुश्किल है, वहां छोटे ऑफ-ग्रिड सोलर सिस्टम कई बार उससे बेहतर साबित हो रहे हैं।
रिपोर्ट में एक और दिलचस्प ट्रेंड सामने आता है। कई देशों में सोलर की असली तस्वीर सरकारी आंकड़ों से भी आगे निकल चुकी है। 10 में से 8 देशों में 2017 के बाद सोलर इंपोर्ट्स, इंस्टॉल्ड कैपेसिटी के आंकड़ों से तीन गुना ज्यादा हैं। यानी जमीन पर एक “डिसेंट्रलाइज्ड एनर्जी रेवोल्यूशन” चल रही है, जो डेटा में पूरी तरह दिख भी नहीं रही।
अगर उदाहरण देखें, तो नामीबिया अपनी बिजली का 35% सोलर से बना रहा है, टोगो 18% पर है। नेपाल और श्रीलंका में इलेक्ट्रिक व्हीकल्स की हिस्सेदारी 70% और 64% तक पहुंच चुकी है।
यह सिर्फ टेक्नोलॉजी का ट्रांजिशन नहीं है। यह dependency का ट्रांजिशन है।
रिपोर्ट बताती है कि 2024 में इन देशों ने 155 अरब डॉलर सिर्फ फॉसिल फ्यूल आयात पर खर्च किए। अगर तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहती है, तो यह बिल और 30 अरब डॉलर बढ़ सकता है।
यानी फॉसिल फ्यूल सिर्फ पर्यावरण का नहीं, अर्थव्यवस्था का भी बोझ है।
और इसका असर सीधा लोगों पर पड़ता है। इन देशों में आज भी करीब 50 करोड़ लोग ऐसे हैं जिनके पास बिजली नहीं है, और उतने ही लोग unreliable सप्लाई से जूझते हैं।
ऐसे में सोलर और इलेक्ट्रिफिकेशन सिर्फ क्लाइमेट का समाधान नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी का भी हल बनते जा रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, अब पुराना सवाल, “विकास या क्लाइमेट?” धीरे-धीरे खत्म हो रहा है।
Ember के प्रिंसिपल डान वाल्टर कहते हैं, “एनर्जी की इकॉनॉमिक्स बदल चुकी है। सोलर और बैटरी की गिरती कीमतें न सिर्फ फॉसिल फ्यूल को पीछे छोड़ रही हैं, बल्कि उन करोड़ों लोगों को भी शामिल कर रही हैं जो अब तक एनर्जी सिस्टम से बाहर थे।”
वहीं CVF-V20 की मैनेजिंग डायरेक्टर सारा जेन अहमद का कहना है, “अब क्लाइमेट और डेवलपमेंट के बीच पुराना समझौता खत्म हो चुका है। ये देश सीधे फॉसिल फ्यूल के रास्ते को छोड़कर आगे बढ़ रहे हैं।”
इस पूरी कहानी में सबसे दिलचस्प बात यही है।
जिन देशों को हम “पीछे” समझते थे, वही अब आगे का रास्ता दिखा रहे हैं।
और शायद क्लाइमेट की सबसे बड़ी कहानी यही है, कि बदलाव हमेशा वहीं से आता है, जहां जरूरत सबसे ज्यादा होती है।