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दिल्ली की हवा में सुधार का दावा, लेकिन आम दिन में प्रदूषण बढ़ा

Posted on October 28, 2026

इस नए विश्लेषण के मुताबिक, 2025 के मुकाबले 2026 में दिल्ली का औसत एक्यूआई 15.8% गिरा, लेकिन रोज़ाना के एक्यूआई का मध्य मान 14.1% बढ़ गया। पराली जलाने की घटनाओं में मामूली कमी के बीच मौसम के आँकड़े भी हवा में सुधार की पूरी वजह नहीं बताते।

दिल्ली की हवा के आँकड़े इस साल एक ऐसी तस्वीर दिखाते हैं, जिसमें औसत प्रदूषण घटा है, लेकिन आम दिन की हवा पहले से अधिक प्रदूषित रही। क्लाइमेट ट्रेंड्स के एक नए विश्लेषण के मुताबिक, 15 सितंबर से 23 अक्टूबर 2026 के बीच दिल्ली का औसत दैनिक वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 142.6 रहा। पिछले साल इसी अवधि में यह 169.3 था। यानी औसत एक्यूआई में 15.8% की गिरावट आई।

लेकिन इसी अवधि में एक्यूआई का मध्य मान 2025 के 135 से बढ़कर 2026 में 154 हो गया। मध्य मान वह स्तर है, जिसके नीचे और ऊपर बराबर संख्या में दिनों के एक्यूआई आते हैं। यह रोज़मर्रा की हवा की स्थिति समझने का एक उपयोगी तरीका है, क्योंकि कुछ बेहद प्रदूषित दिन औसत को काफी ऊपर खींच सकते हैं।

इसलिए इस साल औसत एक्यूआई में आई गिरावट को पूरी अवधि में हवा साफ़ होने का सीधा प्रमाण नहीं माना जा सकता। विश्लेषण के मुताबिक, सबसे प्रदूषित दिनों की संख्या घटने से औसत नीचे आया, जबकि सामान्य दिन की स्थिति में ऐसा सुधार नहीं दिखा।

2025 में इस अवधि के दौरान एक्यूआई 200 से ऊपर 10 दिन रहा था। 2026 में ऐसे दिन घटकर तीन रह गए। पिछले साल अधिकतम दैनिक एक्यूआई 353 तक पहुँचा था, जबकि इस साल यह 245 रहा। 2026 में किसी भी दिन एक्यूआई 300 के पार नहीं गया। इसके साथ ही, दैनिक एक्यूआई में उतार-चढ़ाव भी कम हुआ।

पराली जलाने के आँकड़े क्या बताते हैं?

पंजाब और हरियाणा में धान की पराली जलाने की घटनाओं के उपग्रह-आधारित आँकड़ों की तुलना करने पर भी एक दिलचस्प तस्वीर सामने आती है। 15 सितंबर से 15 अक्टूबर के बीच दोनों राज्यों में दर्ज आग की घटनाएँ 2025 के 201 से घटकर 2026 में 193 रह गईं। यह करीब 4% की कमी है।

इसके बावजूद, इसी अवधि के विस्तारित आकलन में दिल्ली का औसत एक्यूआई 15.8% गिरा। इससे पता चलता है कि इस साल दिल्ली की हवा में आए बदलाव को केवल पराली जलाने की घटनाओं की संख्या से नहीं समझा जा सकता।

2024 से 2025 के बीच पंजाब और हरियाणा में आग की संयुक्त घटनाएँ 88% घट गई थीं, लेकिन दिल्ली का औसत एक्यूआई केवल 3.9% कम हुआ था। वहीं, 2026 में पराली की आग और दिल्ली के एक्यूआई के बीच उसी दिन का सांख्यिकीय संबंध भी काफी कमजोर रहा। यह सहसंबंध 2025 में 0.619 था, जो 2026 में घटकर 0.170 रह गया।

क्लाइमेट ट्रेंड्स की रिसर्च लीड डॉ. पलक बाल्यान के मुताबिक, पराली जलाने से निकलने वाला धुआँ हर साल दिल्ली की हवा पर एक जैसा असर नहीं डालता। हवा की दिशा और रफ्तार, बारिश तथा वातावरण में प्रदूषकों के ऊपर-नीचे फैलने की स्थिति तय करती है कि धुआँ दिल्ली तक पहुँचेगा, बिखरेगा या वातावरण से हटेगा। इसलिए प्रदूषण का आकलन करने के लिए उपग्रह से मिली आग की जानकारी को मौसम और रोज़ाना के वायु गुणवत्ता आँकड़ों के साथ देखना ज़रूरी है।

अल नीनो के बीच मौसम की भूमिका

इस साल की स्थिति को समझने के लिए मौसम के आँकड़े भी अहम हैं। प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति मजबूत हो रही है। अमेरिकी राष्ट्रीय महासागरीय और वायुमंडलीय प्रशासन (एनओएए) के 8 अक्टूबर 2026 के आकलन के मुताबिक, नीनो-3.4 क्षेत्र में समुद्र की सतह के तापमान का अंतर लगभग 2.1 डिग्री सेल्सियस था। एजेंसी ने जनवरी से मार्च 2027 तक मजबूत से बहुत मजबूत अल नीनो की स्थिति बने रहने की 83% से अधिक संभावना जताई थी।

हालाँकि, अल नीनो का मतलब अपने आप अधिक पराली जलना या दिल्ली में अधिक प्रदूषण होना नहीं है। इसका असर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग हो सकता है। स्थानीय बारिश, तापमान, हवा की दिशा और वातावरण की स्थिरता भी प्रदूषण के फैलाव को प्रभावित करते हैं।

दिल्ली के लिए 15 सितंबर से 23 अक्टूबर की अवधि में 2025 और 2026 के मौसम संबंधी मॉडल आँकड़ों की तुलना करने पर मिले-जुले संकेत दिखाई देते हैं। औसत तापमान लगभग समान रहा। औसत हवा की रफ्तार 2.40 से बढ़कर 2.45 मीटर प्रति सेकंड हुई। इससे प्रदूषकों के फैलाव में कुछ मदद मिल सकती है, बशर्ते हवा उन्हें शहर से दूर ले जाए।

दूसरी ओर, वातावरण में प्रदूषकों के फैलने के लिए उपलब्ध ऊर्ध्वाधर परत की औसत ऊँचाई 846 मीटर से घटकर लगभग 810 मीटर रह गई। बारिश भी 46.70 मिलीमीटर से घटकर 10.19 मिलीमीटर रह गई। बारिश हवा से कुछ प्रदूषक कणों को हटाने में मदद करती है। इसलिए इस साल कम बारिश को हवा में सुधार की वजह नहीं माना जा सकता।

ये आँकड़े एनओएए के ग्लोबल फोरकास्ट सिस्टम के मॉडल पर आधारित हैं, स्थानीय मौसम केंद्रों के प्रत्यक्ष अवलोकन नहीं। इनके आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि दिल्ली के एक्यूआई में आई गिरावट में मौसम का कितना योगदान रहा। पंजाब और हरियाणा में हवा की रफ्तार और वातावरण में ऊर्ध्वाधर मिश्रण की स्थिति में आए बदलाव प्रदूषकों के फैलाव में मददगार हो सकते हैं, लेकिन दिल्ली तक उनके वास्तविक परिवहन का आकलन करने के लिए हवा की दिशा और समय के साथ होने वाले बदलावों को भी समझना होगा।

आईआईटी दिल्ली के वायुमंडलीय विज्ञान केंद्र के प्रमुख और नीति अध्ययन के विपुला एवं महेश चतुर्वेदी चेयर प्रोफेसर डॉ. सग्निक डे ने कहा, “अल नीनो को वायु प्रदूषण का सीधा संकेतक नहीं मानना चाहिए। क्षेत्रीय वायु गुणवत्ता पर इसका असर इस बात पर निर्भर करता है कि बड़े पैमाने पर जलवायु में होने वाले बदलाव स्थानीय बारिश, तापमान, हवा के पैटर्न और वातावरण की स्थिरता के साथ कैसे जुड़ते हैं। जलवायु परिवर्तनशीलता और मानव गतिविधियों से होने वाले प्रदूषण के प्रभाव को अलग-अलग समझने के लिए इन मौसमी प्रक्रियाओं को जानना ज़रूरी है।”

साल के कुछ खराब दिनों से आगे देखने की ज़रूरत

दिल्ली में प्रदूषण का स्वास्थ्य पर असर केवल कुछ बेहद खराब दिनों तक सीमित नहीं रहता। लगातार प्रदूषित हवा में साँस लेने का प्रभाव वर्षों तक जमा होता है और स्वास्थ्य जोखिम बढ़ाता है।

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), दिल्ली के प्रोफेसर डॉ. हर्षल रमेश साल्वे ने कहा, “हर साल के एक्यूआई आँकड़ों में जो असर छूट जाता है, वह यह है कि दिल्ली के लोग सिर्फ़ कुछ बेहद प्रदूषित दिनों के संपर्क में नहीं आए हैं। उन्होंने एक दशक तक लगातार ऊँचे प्रदूषण का सामना किया है। लंबे समय तक प्रदूषित हवा के संपर्क में रहना ही बीमारी के उस बोझ को बढ़ाता है, जिसे हम देख रहे हैं।”

उन्होंने बच्चों के फेफड़ों के विकास की रक्षा करने, अधिक जोखिम वाले वयस्कों में हृदय और फेफड़ों की बीमारियों की समय रहते जाँच करने और साफ़ हवा को केवल सर्दियों की आपात स्थिति के बजाय साल भर का सार्वजनिक स्वास्थ्य मुद्दा मानने की ज़रूरत बताई।

क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक आरती खोसला ने कहा, “इस शरद ऋतु में औसत एक्यूआई 15.8% गिरा और सुधार की खबर में यही आँकड़ा सामने आएगा। लेकिन आम दिन की हवा, जिसका सामना दिल्ली के ज़्यादातर लोग करते हैं, 14.1% अधिक प्रदूषित हुई। हमने सबसे खराब दिनों की संख्या घटाई है, रोज़मर्रा की हवा साफ़ नहीं की।”

उन्होंने कहा कि अगर किसी नीति को साफ़ हवा का श्रेय देना है, तो उसकी सफलता को केवल औसत एक्यूआई या एक सर्दी के आँकड़ों से नहीं, बल्कि सामान्य दिन की हवा में लगातार सुधार और लंबे समय के प्रदूषण के संपर्क के आधार पर भी परखना चाहिए।

क्लाइमेट ट्रेंड्स का यह विश्लेषण बताता है कि दिल्ली की हवा में एक साल के दौरान आए बदलाव को किसी एक वजह से जोड़ना मुश्किल है। पराली जलाने की घटनाएँ, स्थानीय उत्सर्जन, हवा की दिशा और रफ्तार, बारिश तथा वातावरण में प्रदूषकों के फैलने की स्थितियाँ एक साथ असर डालती हैं। इस साल सबसे प्रदूषित दिनों में कमी आई है, लेकिन आम दिन की हवा के आँकड़े बताते हैं कि दिल्ली के वायु प्रदूषण की समस्या को हल हुआ नहीं माना जा सकता।

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