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हरा है रंग, बेरंग है हकीकत: खनन की असली कीमत चुका रही हैं अफ्रीकी महिलाएं

Posted on May 1, 2026

हरारे, जिम्बाब्वे: दुनिया तेजी से “ग्रीन एनर्जी” की तरफ बढ़ रही है। इलेक्ट्रिक गाड़ियां, सोलर पैनल, बैटरी स्टोरेज। इन सबके पीछे एक नई दौड़ चल रही है, खनिजों की दौड़। लिथियम, कोबाल्ट, निकल। लेकिन इस दौड़ की एक और कहानी है, जो अक्सर रिपोर्ट्स के हाशिये पर रह जाती है।

अफ्रीका के खनिज-समृद्ध इलाकों में महिलाएं अब इस बदलाव को सवालों के साथ देख रही हैं। उनका कहना है, यह बदलाव जितना “हरा” दिखता है, जमीन पर उतना ही असमान है।

जिम्बाब्वे के बिकिता इलाके के हन्यन्या गांव में रहने वाली गामुचिराई मुनेसी इसे अपने शब्दों में बताती हैं, “लिथियम खनन हमारे लिए एक अभिशाप बन गया है। यह हमारे पहाड़, हमारे पानी और हमारी जमीन को खत्म कर रहा है, जिससे पीढ़ियों से हमारी पहचान जुड़ी है।”

उनकी बात सिर्फ पर्यावरण की नहीं है। यह जीवन, रोज़गार और अस्तित्व की बात है। गांव की महिलाएं कहती हैं कि खनन के साथ उनकी जमीन छिन रही है, आजीविका खत्म हो रही है, और सांस्कृतिक जुड़ाव टूट रहा है।

यह आवाज़ें हाल ही में हुए एक “स्टोरी सर्कल” में सामने आईं, जिसे SHINE Collab ने आयोजित किया। यहां अलग-अलग समुदायों की महिलाओं ने अपने अनुभव साझा किए। छोटे-छोटे समूह, खुली बातचीत, और एक ऐसा मंच जहां वे बिना किसी डर के अपनी बात रख सकें।

इस पहल की अगुवाई कर रहीं Dr Mela Chiponda कहती हैं, “अगर क्लीन एनर्जी की ओर यह बदलाव उसी पुराने ढांचे पर खड़ा होगा, जहां संसाधन निकाले जाते हैं और स्थानीय समुदायों को पीछे छोड़ दिया जाता है, तो इसे न्यायपूर्ण बदलाव नहीं कहा जा सकता।”

उनके मुताबिक, आज जो मॉडल अपनाया जा रहा है, वह कई मायनों में पुराने औपनिवेशिक ढांचे जैसा ही है। संसाधन स्थानीय जमीन से निकलते हैं, लेकिन उनका फायदा वैश्विक बाजार को मिलता है। और नुकसान? वह स्थानीय समुदाय, खासकर महिलाएं झेलती हैं।

इन प्रभावों की एक लंबी सूची है। जमीन पर अधिकार कमजोर पड़ना, बिना भुगतान के काम का बोझ बढ़ना, और कई मामलों में लैंगिक हिंसा का खतरा भी। महिलाओं की भूमिका स्थानीय अर्थव्यवस्था में अहम होने के बावजूद, उन्हें फैसलों में शामिल नहीं किया जाता।

एक हालिया संयुक्त राष्ट्र अध्ययन भी इस चिंता को मजबूत करता है। United Nations University Institute for Water Environment and Health के निदेशक Kaveh Madani कहते हैं, “तकनीकी बदलाव जरूरी हैं, लेकिन उनके अनचाहे असर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अगर एक जगह का पर्यावरणीय नुकसान दूसरी जगह शिफ्ट हो रहा है, तो यह बदलाव न तो टिकाऊ है, न न्यायपूर्ण।”

इस पूरी बहस में एक दिलचस्प बात सामने आती है। जहां एक तरफ खनन से जुड़ी चुनौतियां बढ़ रही हैं, वहीं समाधान की चाबी भी कई बार उन्हीं समुदायों के पास है। डॉ. चिपोंडा बताती हैं कि जिम्बाब्वे के एक नवीकरणीय ऊर्जा प्रोजेक्ट में महिलाओं ने ही इसकी स्वीकार्यता और सफलता को आगे बढ़ाया।

“जब महिलाएं किसी समाधान का हिस्सा बनती हैं, तो वह सिर्फ तकनीकी नहीं रहता, वह सामाजिक रूप से भी टिकाऊ बनता है,” वह कहती हैं।

फिर भी, हकीकत यह है कि दक्षिणी अफ्रीका और ग्रेट लेक्स क्षेत्र में महिलाएं अब भी खनन से जुड़े फैसलों, मुआवजे और मालिकाना हक से बाहर हैं। कांगो जैसे देशों में खनन से जुड़ी प्रदूषण, विस्थापन, बाल श्रम और यौन हिंसा की घटनाएं भी इसी असमानता की ओर इशारा करती हैं।

अब दबाव बढ़ रहा है। सरकारों, बैंकों और कंपनियों से मांग की जा रही है कि वे क्लाइमेट और ऊर्जा नीतियों में “फेमिनिस्ट” नजरिया अपनाएं। मतलब साफ है, पारदर्शिता हो, जवाबदेही हो, और सबसे जरूरी, हर स्तर पर महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित हो।

कहानी का अंत अभी नहीं आया है। लेकिन एक बात साफ होती जा रही है।

ग्रीन ट्रांजिशन सिर्फ “हरा” नहीं हो सकता। उसे न्यायपूर्ण भी होना होगा।

और जैसा कि डॉ. चिपोंडा कहती हैं, “अगर अफ्रीकी महिलाएं इस बदलाव के केंद्र में नहीं हैं, तो यह बदलाव अधूरा है।”

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