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थमने लगी कोयले की मांग, फिर भी भारत में नई खदानों की तैयारी जारी

Posted on August 13, 2026

क्या बदलते ऊर्जा बाज़ार के साथ कदम मिला पाएगा देश?

भारत एक तरफ़ तेज़ी से रिन्यूएबल एनर्जी बढ़ा रहा है। दूसरी तरफ़ नई कोयला खदानों की तैयारी भी जारी है।

यही विरोधाभास Global Energy Monitor (GEM) की नई रिपोर्ट “Still Digging 2026: Coal Mine Expansion Continues Despite Demand Plateau” सामने लाती है। रिपोर्ट कहती है कि दुनिया में कोयले की मांग इस दशक के अंत तक स्थिर होने की उम्मीद है, लेकिन इसके बावजूद नई कोयला खदानों की योजनाएं लगातार बढ़ रही हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में इस समय 834 परियोजनाओं के जरिए 2,521 मिलियन टन प्रति वर्ष (Mtpa) नई कोयला खनन क्षमता प्रस्तावित है। यह पिछले साल की तुलना में करीब 11 प्रतिशत अधिक है। जबकि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) का अनुमान है कि 2030 तक वैश्विक कोयला मांग स्थिर होने लगेगी। वहीं Ember के आंकड़े बताते हैं कि 2025 में पहली बार दुनिया के बिजली उत्पादन में पवन और सौर ऊर्जा ने कोयले को पीछे छोड़ दिया।

रिपोर्ट बताती है कि दुनिया में प्रस्तावित नई कोयला खदानों का लगभग 92 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ़ पांच देशों में केंद्रित है। इनमें चीन, भारत, ऑस्ट्रेलिया, रूस और दक्षिण अफ्रीका शामिल हैं। चीन सबसे आगे है, जहां 1,321 Mtpa नई क्षमता प्रस्तावित है। भारत दूसरे स्थान पर है, जहां 638 Mtpa नई क्षमता विकास के विभिन्न चरणों में है।

लेकिन भारत की कहानी सिर्फ़ नई खदानों तक सीमित नहीं है।

रिपोर्ट कहती है कि भारत के पास अभी भी नई कोयला परियोजनाओं को आगे बढ़ने से रोकने का बड़ा अवसर है। भारत की 101 Mtpa की अंतिम चरण वाली परियोजनाओं में लगभग 90 प्रतिशत सतही (Surface) खदानें हैं, जिन्हें भूमिगत खदानों की तुलना में अपेक्षाकृत जल्दी शुरू किया जा सकता है। हालांकि अधिकांश प्रस्तावित परियोजनाएं अभी निर्माण चरण तक नहीं पहुंची हैं। उन्हें अभी भी अनुमति, वित्त और अंतिम निवेश फैसलों की जरूरत है। इसका मतलब है कि सरकारों, निवेशकों और वित्तीय संस्थानों के पास अतिरिक्त क्षमता को रोकने का अवसर अभी भी मौजूद है।

रिपोर्ट यह भी बताती है कि भारत का बिजली क्षेत्र तेजी से बदल रहा है।

इस वर्ष गर्मियों के दौरान देश में रिन्यूएबल एनर्जी से रिकॉर्ड बिजली उत्पादन देखने को मिला। इसका असर कोयले की मांग पर भी पड़ा। रिपोर्ट के अनुसार भारत के ताप बिजलीघरों में इस समय 62 दिनों के बराबर कोयले का भंडार मौजूद है, जो रिकॉर्ड स्तर पर है। हालांकि उत्पादन बढ़ा है, लेकिन ताप बिजलीघर पहले की तुलना में कम क्षमता पर चल रहे हैं, इसलिए कोयले की खपत और आपूर्ति की रफ्तार धीमी हुई है।

इसी बदलाव को देखते हुए भारत की ऊर्जा नीति भी बदल रही है।

रिपोर्ट के मुताबिक राष्ट्रीय विद्युत नीति अब कोयले को बिजली का एकमात्र आधार नहीं, बल्कि रिन्यूएबल एनर्जी के साथ चलने वाले लचीले (Flexible) स्रोत के रूप में देखती है। नीति में कहा गया है कि भविष्य में ताप बिजलीघरों को अधिक लचीला बनाना होगा ताकि बैटरी स्टोरेज और रिन्यूएबल एनर्जी के बड़े पैमाने पर ग्रिड में एकीकरण का रास्ता आसान हो सके।

दिलचस्प बात यह है कि भारत सिर्फ़ नई खदानों की योजना ही नहीं बना रहा, बल्कि पुरानी खदानों को वैज्ञानिक तरीके से बंद भी कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार देश अब तक 42 कोयला खदानों को वैज्ञानिक तरीके से बंद कर चुका है, जिनमें से 33 खदानें पिछले एक वर्ष में बंद हुई हैं। सरकार अगले दो से तीन वर्षों में 147 और खदानों को वैज्ञानिक तरीके से बंद करने का लक्ष्य लेकर चल रही है।

रिपोर्ट एक और बड़ी चिंता की ओर भी इशारा करती है। दुनिया की लगभग 70 प्रतिशत प्रस्तावित कोयला खनन क्षमता अभी निर्माण शुरू होने से पहले के चरण में है। अगर ये परियोजनाएं आगे बढ़ती हैं, तो आने वाले दशकों तक महंगे और अधिक कार्बन उत्सर्जन वाले बुनियादी ढांचे में निवेश फंस सकता है। ऐसे समय में जब पवन और सौर ऊर्जा लगातार सस्ती होती जा रही है, यह भविष्य में Stranded Assets यानी ऐसे निवेश का जोखिम बढ़ा सकता है जिनकी आर्थिक उपयोगिता समय के साथ कम हो जाए।

रिपोर्ट यह भी बताती है कि कोयला खनन से निकलने वाली मीथेन पर दुनिया भर में पर्याप्त निगरानी नहीं हो रही। किसी भी देश में सतही कोयला खदानों के लिए मीथेन उत्सर्जन की अनिवार्य निगरानी का नियम नहीं है, जबकि कई खदानें बड़ी मात्रा में मीथेन छोड़ सकती हैं।

Global Energy Monitor की प्रोजेक्ट मैनेजर डोरोथी मेई कहती हैं कि ऐसे समय में जब बाज़ार के संकेत बदल रहे हैं, नई कोयला खदानों में निवेश सरकारों, कंपनियों और निवेशकों के लिए आर्थिक जोखिम बढ़ा सकता है। वहीं रिपोर्ट की सह-लेखक टिफ़नी मीन्स का कहना है कि कम लागत वाली स्वच्छ ऊर्जा के तेजी से बढ़ने के कारण नई कोयला खदानों का आर्थिक आधार लगातार कमजोर हो रहा है। उनके मुताबिक निर्माण शुरू होने से पहले की परियोजनाओं को रोकने का अवसर अभी भी मौजूद है।

भारत के लिए यह रिपोर्ट एक अहम सवाल छोड़ती है। देश को अभी भी बिजली की बढ़ती मांग पूरी करने के लिए कोयले की जरूरत है। लेकिन उसी समय रिन्यूएबल एनर्जी भी तेज़ी से बढ़ रही है और ऊर्जा प्रणाली बदल रही है। ऐसे में आने वाले वर्षों की चुनौती सिर्फ़ यह नहीं होगी कि कितना कोयला निकाला जाए, बल्कि यह भी होगी कि बदलते ऊर्जा बाज़ार में किस तरह के निवेश भविष्य के लिए टिकाऊ साबित होंगे।

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